PoemSri

राजनीती

(१)   सब का अपना---------इमान धरम है
       एक दूजे से---------ना कोई कम है
       एक से बढकर---------एक हैं सबही
       नियत के भी---------नेक हैं सबही
(२)  है--- फिर भी----------मारामारी जमकर
       देखें-- कौन है लेता----------किस्से टक्कर
       सबकी अपनी-----------फ़ौज खड़ी है
       लिए तलवार----------मरने पर अड़ी है
(३)  ज्ञान की इनको----------जरूरत नहीं है
       पुरखों की समझें---इतनी फुर्सत नहीं है
       इनके पुरखे-----------इनके लिए
       इस धरा को स्वर्ग----------बना के मरे
(४)  उसी स्वर्ग को--------नर्क की ओर
       ढकेलन को–----------ये लड़ कट के मरें
       मरना तो----------हर बंदे को है
       लेकिन जल्दी मरें---------ये शौक---
       जो-----------तलवारों के धंधे को है

(५)  अपना धंधा---------चमके खूब
       ये साफ झलकती-----------बातें हैं
       राजनीती में--बस-वस्त्र---झकाझक
       बाकी-----------काली करतूतें हैं
(६)  कौन—किसे---------समझाये कैसे
       कब तक चलता------------रहेगा ऐसे
       उनके बाद-------------उनकी संतानें
       क्या पैदा होंगी----------बंदूकें तानें
(७)  क्यूँ---------जनम से पहले ही मरने को
       एक मर-भूमि-----------हम तैयार करें
       जो जनमभूमि है---जन्मों से अपनी
       हम---क्यूँ न-------उसका श्रृंगार करें

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